तबले वाध का जन्म एवं क्रमिक विकास

प्राचीन ग्रंथो में कहीं भी तबला नमक वाद्य का उल्लेख नहीं मिलता है संगीत पारिजात में तथा वाद्य प्रकाश जैसे उत्तर कालीन ग में भी तबले का उल्लेख नहीं है तबले के विषय में इस अंधकार में स्थिति का लाभ उठाकर वह मुसलमान वादकों ने तबले का जन्म का श्रेय अमीर खुसरो को मार दिया इसका मुख्य कार्य या रहा की लेखक मोहम्मद कर्म इमाम वह पहला व्यक्ति है जिसने हजरत अमीर खुसरो के मृत्यु के पास और 30 वर्ष बाद यह कहानी घड़ी की हजरत अमीर खुसरो सितार ढोलक तथा 17 तालों के आविष्कारक है।                          उल्लेखनीय है कि मुसलमान का एक बड़ा वर्ग संगीत को इस्लाम की दृष्टि से हराम मानता था और आज भी मानता है परंतु यह वर्ग भी हजरत अमीर खुसरो को महापुरुष मानने के लिए विवश है और इसी कारण से अनेक आविष्कार हजरत अमीर खुसरो के मत थे बड़े जाते हैं साथ ही समझ संगीत विद्वान भी या मानते हैं कि तबले का सबसे पहले घराना जो दिल्ली घराना कहलाता है उसका सिद्धार्थ खान के द्वारा प्रारंभ हुआ उसका सिद्धार्थ खान का जन्म 18वीं शताब्दी के लगा हुआ था क्योंकि यह दतिया के प्रसिद्ध मिरदंग वादक स्वर्गीय कुंदे सिंह के समकालीन थे औरकुदऊ  सिंह का स्वर्गवास 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध मैं हुआ है अभी आप प्रश्न उठता है कि तबले का जन्म अमीर खुसरो द्वारा 13वीं शताब्दी में हो चुका था तो इसका विकास 19वीं शताब्दी तक क्यों नहीं हुआ इन सब तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तबले का आविष्कार अमीर खुसरो ने नहीं किया है अब विचार करना है कि इस बात का जन्म का वह किस प्रकार हुआ डॉक्टर लालमणि मिश्रा ने अपने ग्रंथ भारतीय संगीत वाद्य में तबले की उत्पत्ति का प्रकाश डाला उनके कथन का सारांश है कि तबला का उत्पत्ति कुछ विद्वानों ने भारत कालीन र्ददुर नमक वाथसे मानी है यह वाद्य घड़े के समान 9 अंगुल के मुख का पर अंगुल के विस्तार की पुरी से सुतलियों द्वारा पणव की भांति कसा हुआ का रूप परिवर्तित होते होते आज से खाल से नहीं माना जाता है और घड़ा या घाटम नाम के वाद से प्रचार में है किंतु वह तबले की भांति दो भागों में दाएं और बाएं में ना था इसलिए तबले का विकास इसे नहीं माना जा सकता और उनका कहना है कि वास्तव में तब्दील का विकास प्राचीन में जंग से ही हुआ है मृदान वर्णन में या बताया गया है कि प्राचीन मृदान तीन भागों में होता था इसमें एक भाग अंकित था और वह पृथ्वी पर लेटा रहता था मृदान का यही भाग सबसे अधिक महत्वपूर्ण था भारत काल में मृदान जी जैसे आज तबले में दाएं और बाएं दो भाग है उसे प्रकार उसे समय इसमें तीन भाग थे इस प्रकार भरत मृदंग में वादन करने के लिए चार मुख होते थे आगे वर्णन है कि मृदान के तीन भागों में छठी सातवीं शताब्दी में परिवर्तन होने लगा तथा उसके बाद कुछ दिनों तक गोंद का एक भाग तथा एक घड़ा वाला भाग प्रयुक्त होता रहा कम सम्रदान का वह उर्दू मुखी वार्ड भी है गया और उनके आंतरिक भाग से मृदंग था मर्दन नाम से प्रचलित रह गया उसे समय मृदंग के दोनों उर्दू मुखी भागों का अथवा आंकिक भाग का ही दो उर्दू मुखी के रूप में अलग-अलग वादन होता था किंतु उसका विशेष नाम न होने के कारण इसका उल्लेख शास्त्र ग में नहीं किया गया अनुमान है कि 16वीं शताब्दी के आसपास मृदंग के दो रूप करके इसका वादन प्रारंभ हुआ तभी इसका नामकरण तबला भी हो गया किंतु इससे मुझे सुधार सिद्धार्थ नहीं किया उसे सुधार से या अभिप्राय है कि पहले पब्लिक के केवल दाएं भाग पर ही स्याही लगाई जाती थी और बाएं धागे पर मृदान की भांति गीले आटे की तूलिका लगाई जाती थी ऐसी स्थिति में तबले पर हथेली को चमड़े पर घिसकर गम की भांति बजाए जाते हैं नहीं बसते थे इस प्रकार के बोलो को बजाने के लिए सिद्धार्थ खान बाय देंगे पर भी आते की पुलिक के स्थान की तरह बाकी स्याही लगा दे और स्वरूप आप तबले पर मृदंग और ढोलक दोनों वादे पर बजने वाले बोल सरलता से बजने लग आज का लोक प्रिय वाध तबला है

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