होलिका दहन

होलिका दहन हिंदू त्योहार होली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात को मनाया जाता है। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में अग्नि जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

होलिका दहन की कथा भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी हुई है। हिरण्यकश्यप चाहता था कि सभी लोग केवल उसकी पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार वह असफल रहा।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान था। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने का प्रयास किया, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जलकर राख हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। तभी से यह त्योहार बुराई के नाश और भक्ति की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

होलिका दहन की परंपराएँ

  1. लकड़ियों और उपलों (गाय के गोबर से बने उपले) का ढेर बनाया जाता है।
  2. होलिका की पूजा की जाती है—उसमें रोली, चावल, हल्दी, फूल, गंगाजल आदि चढ़ाए जाते हैं।
  3. परिक्रमा की जाती है—लोग हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामनाएँ माँगते हैं और होलिका की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं।
  4. अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जिससे बुरी शक्तियों का नाश होने की मान्यता है।

होलिका दहन का महत्व

  • यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
  • घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए लोग इसकी अग्नि का प्रयोग करते हैं।
  • इसे नए मौसम के आगमन और कृषि कार्यों की शुरुआत का संकेत भी माना जाता है।

होलिका दहन 2025 तिथि

होलिका दहन 2025 में 13 मार्च की रात को होगा, और उसके अगले दिन 14 मार्च को होली खेली जाएगी।

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