साधारण पति पत्नी व बच्चों से मिलकर परिवार बनता है किंतु रक्त से संबंधित लोगों को इस समूह में रखा जाता है जो एक साथ रहते हैं सोते हैं खाते पीते हैं ऐसे समूह को परिवार कहते हैं। परिवार का परिचय एवं महत्व परिवार का महत्व विशेष है जब इंसान परिवार में रहता है तो उसकी सोच अलग रहती है वह सब के बारे में सोचता है वह अपने से पहले दूसरों की बारे में सोचता है वह केवल सीमित तारे में नहीं रहता है परिवार एक इंसान को चिंता फिक्र इज्जत सम्मान सबसे सिखाती है परिवार का महत्व सामाजिक क्षेत्र में बहुत बड़ा है एक अच्छे परिवार वाले एक साल सभी समाज की उन्नति करते हैं सभी समाजों में बच्चों का जन्म और पालन पोषण परिवार में होता है बच्चों को संस्कार करने वाले और समाज में आचार व्यवहार में और उन्हें शिक्षित करता है यह काम परिवार का होता है व्यवहार में उन्हें व्यवहार कुशल बनता है इसके द्वारा समाज की संस्कृति विरासत एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा परिवार पर निर्धारित होती है परिवार में सबके कार्यों का विभाजन है बच्चों का काम अपनी पढ़ाई लिखाई खेलकूद और स्त्रियों का काम घर में देखभाल बच्चों को वह पति को और उनकी माता-पिता की देखभाल और पुरुषों का बाहर का काम है। उत्पत्ति। परिवार की उत्पत्ति की कोई सीमा नहीं है यह बहुत पुरानी और प्रचलित पता है जिसमें पति-पत्नी और बच्चों का संभोग से बनता है संसार में दाग पति जीवन से एक पत्नी विवाह में सबसे सबसे ज्यादा प्रचलित है अर्थात वह समझ में पति को बहुत पत्नियों को रखने का प्रथा प्रचलित है ओरमें दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है, यद्यपि अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट है। इसके विपरीत टोडा और खस जनजातियों में और तिब्बत के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा तथा एक प्रकार के यूथ
विवाह की प्रथा है। इसी प्रकार भारत में खासी, गारो और अमरीका में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है।
आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक संस्था थी। जीवन का अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से संपन्न होता था। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं है। बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है। में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है, यद्यपि अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट है। इसके विपरीत टोडा और खस जनजातियों में और तिब्बत के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा तथा एक प्रकार के यूथ विवाह की प्रथा है। इसी प्रकार भारत में खासी, गारो और अमरीका में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है।
आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक संस्था थी। जीवन का अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से संपन्न होता था। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं है। बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है। । । ।
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